Poshan Maah 2021: क्या भारत बन सकता है कुपोषण मुक्त? पोषण विशेषज्ञ दीपा सिन्हा ने पोषण पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर दिए | Nutrition

September 10, 2021 0 Comments



कुपोषण एक ऐसा मुद्दा नहीं है जो केवल एक बच्चे को प्रभावित करता है, बल्कि यह राष्ट्र के समग्र स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है. यह निवेश है जो आपको रिटर्न देगा

जैसा कि हम पोषण माह 2021 मनाते रहे हैं. जरूरतों, सही पोषण के साथ-साथ एक राष्ट्र के रूप में हमारे सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में बात करना बहुत जरूरी है. दूध, दालें, गेहूं, चावल, फल, सब्जियां जैसे फूड्स के दुनिया के सबसे बड़े प्रोड्यूसर में से एक और कुपोषण को संबोधित करने वाली कई योजनाओं वाला देश होने के बावजूद भारत अभी भी नेशनल टारगेट हासिल करने से बहुत दूर है.

एनडीटीवी-डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया के साथ एक फेसबुक लाइव शेसन में अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली की सहायक प्रोफेसर दीपा सिन्हा ने पोषण पर स्टंटिंग, वेस्टिंग, वजन कम, मोटापा, और एनीमिया को कैसे ठीक किया जा सकता है जैसे सामान्य सवालों के जवाब दिए और चर्चा की कि भारत सभी कुपोषण मापदंडों में अपने लक्ष्यों को क्यों चूक रहा है.

NDTV: आजादी के 70 साल बाद भी हम कुपोषण से जूझ रहे हैं. हम अपने देश में कई लोगों को सुलभ और किफायती पोषण उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं. आपको क्या लगता है कि हममें कहां कमी है?

दीपा सिन्हा: जब आप कुपोषण को देखते हैं, तो भोजन की कमी मुख्य निर्धारक होती है. भोजन के साथ कई अन्य समस्याएं हैं जो कुपोषण का कारण बन सकती हैं, जैसे संक्रमण, दस्त, मलेरिया के साथ-साथ स्वच्छ पानी और स्वच्छता तक पहुंच जैसे कारक. जब आप भोजन के बारे में बात करते हैं, तो हर भोजन आपका पेट भरने वाला नहीं होता है, यह पौष्टिक, अच्छी गुणवत्ता वाला भोजन होना चाहिए, खासकर गर्भावस्था के दौरान और जीवन के पहले 2 सालों में. जब आप भारत में इनमें से प्रत्येक कारक को देखना शुरू करते हैं, तो उनमें से ज्यादातर में हमारे पास कमी होती है और उन सभी के संयोजन के रूप में हम बढ़ी हुई कुपोषण दर देख रहे हैं.

इसका दूसरा पहलू यह है कि पोषण के तहत स्टंटिंग, वेस्टिंग कम नहीं हो रहा है, लेकिन दूसरी तरफ ज्यादातर वयस्कों में मोटापा बढ़ रहा है, लेकिन बचपन में मोटापा भी भारत में बढ़ती प्रवृत्ति दिखा रहा है. हमारे पास एक तरफ टीबी और मलेरिया है और दूसरी तरफ हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज है, जो अधिक वजन होने से संबंधित है.

NDTV: भारत में फूड सेक्योरिटी एक बड़ी चुनौती है. हम लीडिंग फूड प्रोड्यूसर हैं, यह कमी का मुद्दा नहीं है फिर हम कहां गलत जा रहे हैं?

दीपा सिन्हा: जब भारत में फूड सिक्योरिटी की बात आती है, तो समस्या उपलब्धता के साथ नहीं है क्योंकि हम पर्याप्त मात्रा में स्टेपल उगाते हैं. समस्या वितरण है, एक पहलू सार्वजनिक वितरण है और दूसरा यह है कि कम वेतन या बेरोजगारी के कारण लोग इन तक पहुंच नहीं बना पा रहे हैं.

पोषण के लिए सार्वजनिक समर्थन के मामले में हमारे पास घरेलू स्तर के साथ-साथ राज्य स्तर पर भी संसाधनों की कमी है. अगर अधिक रोजगार सृजित होते हैं, अगर न्यूनतम नौकरियों की गारंटी दी जाती है, चावल को स्थिर रखा जाता है, तो यह सब इस बात को जोड़ देगा कि एक परिवार अपने परिवार के भोजन को सुरक्षित रखने में कितना सक्षम है. अगर इन सभी को स्थिर रखा जाए तो फेमिली फूड सिक्योरिटी सुनिश्चित कर सकते हैं.

NDTV: पोषण माह, एनीमिया मुक्त भारत, आदि जैसी पहलों के लिए सरकार और देश पोषण के बारे में बात कर रहे हैं. ऐसे मुद्दों पर बोलना कितना महत्वपूर्ण है?

दीपा सिन्हा: यह महत्वपूर्ण है. बहुत सारे अध्ययनों से पता चलता है कि बचपन में स्टंटिंग केवल बचपन के दौरान एक समस्या नहीं है, बल्कि यह वयस्क परिणामों की भविष्यवाणी करता है कि लोग कितने प्रोडक्टिव हैं, वे बीमारी के प्रति कितने संवेदनशील हैं और यहां तक कि वे कितने समय तक जीवित रहते हैं. तो एक बिंदु से परे, अगर हमारा मानव विकास इतना कम है, तो वह एक बाधा बन सकता है जो रोक सकता है कि हम कितनी क्षमता तक पहुंच सकते हैं. इसलिए, कुपोषण एक ऐसा मुद्दा नहीं है जो केवल एक बच्चे को प्रभावित करता है, बल्कि यह राष्ट्र के समग्र स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है. यह निवेश है जो आपको रिटर्न देगा.

NDTV: कौन सा पौष्टिक भोजन वास्तव में हमें हेल्दी रख सकता है?

दीपा सिन्हा: पौष्टिक भोजन वह है जिसे हम बैलेंस डाइट के रूप में जानते हैं. भारत एक विविध देश है, इसलिए देश के विभिन्न हिस्सों में थाली अलग दिखेगी. लेकिन इसमें मूल रूप से दाल, चावल, अनाज, दही और हरी सब्जियों के मुख्य खाद्य समूह हैं. चुनौती यह है कि इसे हर दिन प्राप्त करें, अन्यथा पौष्टिक भोजन कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाहर से आने की जरूरत है, बल्कि यह वही है जिसे हम पारंपरिक रूप से विविधता के साथ खा रहे हैं.

NDTV: बिना कुपोषण के बच्चों को क्या खाना चाहिए?

दीपा सिन्हा: भले ही किसी बच्चे को कुपोषण हो या न हो, डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश हैं कि छह महीने तक उन्हें केवल स्तनपान कराना चाहिए और कुछ नहीं. छह महीने का होने तक बच्चे को पोषण और रोग प्रतिरोधक क्षमता देने के लिए मां का दूध ही काफी है.

हमारे देश में समस्याओं में से एक यह है कि जब आपको सप्लीमेंट डाइट की ओर रुख करना पड़ता है, जिसमें अपने बच्चे को सेमी-सोलिड डाइट खिलाना शुरू करते हैं, तब भी वे उसे दूध देते हैं. उन्हें घी के साथ खिचड़ी जैसा खाना दिया जाना चाहिए क्योंकि बच्चे का पेट छोटा होता है, मसली हुई सब्जियां आदि होती हैं और धीरे-धीरे वह अन्य खाना देना शुरू कर देता है जो परिवार खाता है. छोटे बच्चों के लिए अलग-अलग सिफारिश की जाने वाली एकमात्र चीज अधिक फैट शामिल करना है क्योंकि इसमें कैलोरी ज्यादा होनी चाहिए. यही कारण है कि पारंपरिक रूप से हमारे घर में छोटे बच्चों के भोजन में घी डाला जाता है.

NDTV: किस उम्र में बच्चों को कुपोषण का सबसे अधिक खतरा होता है और कुपोषित बच्चों को क्या दिया जा सकता है?

दीपा सिन्हा: हमारे देश के आंकड़ों के मुताबिक, 20 फीसदी बच्चे कुपोषित यानी जन्म के समय कम वजन के साथ पैदा होते हैं और इसका संबंध मां के पोषण से है, लेकिन जब वे 2 वर्ष के होते हैं, तब तक 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषित होते हैं.

कुपोषित बच्चों के लिए लोकल फूड्स, नियमित भोजन, साफ-सफाई और स्वच्छता की सबसे अधिक सिफारिश की जाती है. चूंकि ये बच्चे संक्रमण के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं और पोषक तत्व अवशोषित नहीं होते हैं, इसलिए स्वच्छता पर विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत है. नियमित अंतराल में नियमित भोजन दिया जाना चाहिए लगभगर हर दो घंटे में.

देखभाल करने वाला भी बहुत महत्वपूर्ण है; क्योंकि इस उम्र में बच्चा खुद खाना नहीं मांग सकता, बच्चे के साथ रहने के लिए ज्यादातर समय किसी का होना जरूरी है. गरीब परिवार में यह भी एक संकट है, जिसमें मां काम कर रही है और बड़े भाई-बहन के पास बच्चा रखा होता है जो समझ नहीं पा रहा है कि बच्चे की क्या जरूरतें हैं.

NDTV: हम अपने पोषण लक्ष्यों को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या पोषण की समस्या पर कोई शोध प्रकाशित हुआ है?

दीपा सिन्हा: ऐसा लगता है कि हम बहुत अच्छा नहीं कर रहे हैं. नवीनतम राष्ट्रीय स्वास्थ्य और परिवार सर्वेक्षण 5 के अनुसार, जो केवल 22 राज्यों के लिए जारी किया गया था, डेटा 2019 के अंत में और 2020 की शुरुआत में कोविड से पहले दर्ज किया गया था. 2015-16 में आयोजित पिछले एनएफएचएस 4 की तुलना में हमने लगभग कोई प्रगति नहीं की है. कुछ राज्यों में स्टंटिंग और एनीमिया बढ़ गया, जबकि कुछ जगहों पर यह बहुत कम हो गया. यह प्रवृत्ति आगे कोविड से प्रभावित होगी, इसलिए ऐसा नहीं लगता कि हम अपने राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्यों तक पहुंच पाएंगे. यह चिंता का विषय है, हमें देश में पोषण को अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत है.

NDTV: हम जो कुछ भी खाते हैं वह हमारे लिए हेल्दी नहीं है, उन सभी के लिए न्यूनतम पोषण क्या हो सकता है जिन्हें खाने के लिए पर्याप्त नहीं मिल रहा है.

दीपा सिन्हा: ICMR भारतीयों के लिए अनुशंसा आहार के बारे में बताता है, जो बहुत विस्तृत और सक्रिय पुरुषों, सक्रिय महिलाओं, गतिहीन जीवन शैली, विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों आदि के लिए वर्गीकृत है. कुल मिलाकर अगर हम यह कहना चाहते हैं कि हम फूड पिरामिड सीखना चाहते हैं कि विभिन्न फूड ग्रुप्स से कितना खाना चाहिए. सबसे ज्यादा क्या खाना चाहिए अनाज, फिर कार्बोहाइड्रेट, फिर प्रोटीन और फिर विटामिन और खनिज जो फलों और सब्जियों से आते हैं.

जब हम प्रोटीन के बारे में बात करते हैं, तो पशु प्रोटीन भी महत्वपूर्ण होता है. साथ ही दूध, अंडे और मांसाहारी चीजें आती हैं, और अंत में, वसा और तेल और पानी आता है. ये चीजें हैं जो एक अच्छा भोजन बनाती हैं.

संतुलित भोजन कौन नहीं करना चाहेगा? समस्या यह है कि वे इसे वहन नहीं कर सकते. डेटा से पता चलता है कि हमारे पास एक ग्रेन हेवी डाइट है. पशु प्रोटीन और फल और सब्जियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.

NDTV: भारत में कुपोषण दूर करने के लिए क्या करना चाहिए?

दीपा सिन्हा: एक स्तर पर जब कुपोषण और इसके लिए काम करने वालों की समस्याओं की बात आती है, तो बहुत सारी समानताएं होती हैं और लोग इस बात से सहमत होते हैं कि क्या किया जाना चाहिए. हम फूड सिक्योंरिटी की बात कर रहे हैं, जो इस समस्या को हल करने का मुख्य ढांचा होगा. दूसरा एक अल्पकालिक या तत्काल समाधान है, जिसे हम सीधे तौर पर महिलाओं और बच्चों की कमजोर आबादी को संबोधित करते हैं, जिसके लिए हमारे पास आईसीडीएस और मिड-डे मील जैसे कार्यक्रम हैं, लेकिन वर्तमान समस्या यह है कि आंगनबाड़ियों – पोषण के लिए मुख्य संस्थान – वहां कई कमियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है.

NDTV: कोविड ने पोषण की समस्या को कितना पीछे धकेल दिया है?

दीपा सिन्हा: जब चीजें थोड़ी ठीक होने लगी थीं, जब आंगनवाड़ी केंद्र वापस खुल रहे थे, तब फिर दूसरी लहर सामने आ गई. हम जानते हैं कि पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर बहुत खराब थी और ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक फैली हुई थी.

इसलिए स्वास्थ्य के इस संकट ने स्कूलों और आंगनबाड़ियों को बंद कर दिया है. बच्चों की मध्याह्न भोजन, राशन या नकद के रूप में पूरक भोजन प्राप्त करना जारी रखने की नीति के बावजूद यह बहुत अपर्याप्त रहा है.

भोजन का अधिकार अभियान ने नवंबर 2020 में इस पर एक क्षेत्र सर्वेक्षण किया, इसमें पाया कि 50 प्रतिशत से भी कम बच्चे जो ड्राई राशन के पात्र थे, वास्तव में उन्हें वह हर महीने नहीं कभी-कभार ही मिलता था.

दिल्ली में एक स्कूली बच्चे को पूरे महीने के लिए 120 रुपये मिलेंगे. यह वास्तव में एक दिन में एक भोजन में तब्दील नहीं होता है और ज्यादातर को बैंक जाने और इसका लाभ उठाने में इतनी परेशानी होती है.

इससे न केवल भोजन वितरण के मामले में सेवाएं बाधित हुई हैं, बल्कि आंगनवाड़ी विकास की निगरानी और परामर्श जैसे कई अन्य काम बढ़े हैं, जिनमें से कोई भी महामारी शुरू होने के बाद से नहीं हुआ है.

NDTV: क्या देश में लिंग भेद बहुत बड़ा है जिसे दूर करने की जरूरत है?

दीपा सिन्हा: लिंग कई तरह से पोषण को प्रभावित करता है. एक पहेली है कि अफ्रीका में भारत की तुलना में बेहतर पोषण संबंधी परिणाम हैं, विभिन्न अध्ययनों के बाद जो स्पष्टीकरण दिया गया वह यह है कि अफ्रीका में हमारे मुकाबले बेहतर लिंग संबंध हैं. लिंग संबंध पोषण को कैसे प्रभावित करते हैं? आखिरी और सबसे कम खाना. भारत में ज्यादातर घरों में ऐसा ही होता है और इसका मतलब है कि एक महिला पहले सबको खिलाएगी और फिर अंत में खाएगी.

गरीब घरों में इसका मतलब यह हो सकता है कि उसके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है. अगर अंडा है, तो महिला को नहीं मिलता है. इसके कारण गर्भवती महिला को अपनी जरूरत का पोषण नहीं मिल पाता और अंत में एक कुपोषित बच्चे को जन्म देती है. यह सिलसिला जारी रहता है. मजे की बात यह है कि बचपन में यह जेंडर गैप नजर नहीं आता, जब बालिकाएं बड़ी होने लगती हैं, तो किशोरावस्था से ही आप देखते हैं कि गैप बढ़ने लगता है.

जब स्तनपान की बात आती है, अगर यह दो महीने का बच्चा है, तो उसे हर दो घंटे में दूध पिलाने की जरूरत है. हमारे देश में गरीब महिलाओं को समय का विशेषाधिकार नहीं है. इनमें से 95 प्रतिशत महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, उनके पास मातृत्व अवकाश या चाइल्डकैअर सेवाएं नहीं हैं, ये सभी कारक बच्चे के पोषण संबंधी परिणामों को प्रभावित करते हैं. फैक्ट यह है कि बच्चे की देखभाल का पूरा बोझ मां पर ही चला जाता है, जिससे कुपोषण भी होता है.

NDTV: हेल्दी लाइफ को बनाए रखने के लिए क्या किया जा सकता है?

दीपा सिन्हा: मोटापा एक ऐसी समस्या है जिस पर हम अपने देश में पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं. एक तरफ हमारे पास ऐसे लोग हैं जो बैलेंस डाइट लेने में असमर्थ हैं, लेकिन दूसरी तरफ हमारे पास एक ऐसी आबादी है जो तेजी से प्रोसेस्ड फूड्स का सेवन कर रही है. यह एक बहुत ही सरल सूत्र है. वही करो जो तुम पारंपरिक रूप से करते आए हो लेकिन हम सभी विभिन्न रूपों में डिब्बाबंद फूड्स की ओर बढ़ रहे हैं.

इसलिए शहरी क्षेत्र के गरीब लोग भी फल खरीदने से ज्यादा मैगी खरीदने में सक्षम हैं; या केले या सेब से ज्यादा बिस्कुट का एक पैकेट भी. इस समय हमारे देश में जिस तरह का ईको सिस्टम है. प्रोसेस्ड फूड्स ने भारत में दोहरा बोझ डाला क्योंकि हमने बच्चों को हाई फैट और शुगर का सेवन करने से मोटापे का कारण बना दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे अति पोषित हैं क्योंकि उन्हें कोई पोषक तत्व नहीं मिला. हम सभी को यह ध्यान रखना चाहिए कि हमें बहुत सारा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड नहीं खाना चाहिए.

फल और सब्जियां हमें सबसे अधिक मात्रा में विटामिन और खनिज प्रदान करती हैं जिनकी हमें जरूरत होती है, इसलिए अगर हम इन्हें मैगी के साथ रिप्लेस कर रहे हैं, तो यह निश्चित रूप से हेल्दी नहीं है. सही खाना महत्वपूर्ण है.

पोषण माह जैसी पहल करना अच्छा है क्योंकि यह हमें उन विषयों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करता है जो हम अलग नहीं कर सकते. पोषण फ्लू या डेंगू की तरह कोई मौसमी समस्या नहीं है, यह एक रोजमर्रा की समस्या है. इसे लगातार लोगों की नजरों में रहने की जरूरत है. हमें सही प्रकार की खाने की आदतों को सुनिश्चित करने और प्रोत्साहित करने की जरूरत है. न केवल इन हफ्तों और महीनों के होने के संदर्भ में बल्कि पोषण के लिए और अधिक निवेश करने के संदर्भ में.

 





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